ऐसी भी क्या मजबूरी जो,मुँह अपना ना खोल सके ।

ऐसी भी क्या मजबूरी जो,मुँह अपना ना खोल सके ।
कठवा और उनाव कांड पर,एक शब्द ना बोल सके ।।


मन करता है  तिलक लगाकर,मैं भी जय श्री राम कहुँ ।
राधे राधे करता घूमू,कृष्णा को घनश्याम कहु।।

अल्ला -अल्ला अकबर -अकबर,जोर जोर से चिल्लाऊ ।
शर्त यही है लेकिन मेरी, आशिफा को न्याय  दिलाऊ।।

नहीं कर सकते न्याय अगर तो, क्यों मिथ्या विश्वास करूँ।
एक निवाला दे नहीं सकते,क्यों इनका उपवास  करूँ ।।

रावण के घर से भी सीता, बेदागी आ जाती थी ।
कृष्ण नाम को लेकर मीरा ,जहर घूट पी जाती थी ।।

द्रोपदी का चीर बढाकर, तूने     लाज.    बचाई   थी।
प्रहलाद को जिन्दा बचाकर, होलिका तूने जलाई थी।।

कहाँ छुपा आज बता तू ओ कण- कण  में  रहने  वाले ।
चारो और हाहाकार मचा है ,ओ घट- घट में रहने वाले।।

तेरे ऊपर उंगली उठती, कहा छुपा  क्यों   मोन  खड़ा।
किससे तू अब खुद डरता है ,है  तुझसे यहाँ कोन बड़ा।।

रूह कापती है जिसको सुनकर ,सदमा कितना गहरा है ।
अल्ला-अल्ला करने वालो , अल्ला  सचमुच  बहरा  है ।।

चलो राम नहीं   आ  सकता ,वो सुप्रीम कोर्ट चला गया ।
औ पैगम्बर तू ही आ जाता, क्यों आसिफा को छला गया।

रावण ने भी तेरे डर से, छुआ नहीं था सीता को ।
लेकिन तेरे घर के अंदर,लूट लिया आशिफा को।।

कितनी आशिफा छ्ली गयी,क्या तुझे दर्द नहीं होता है ।
तू  ही  बता  मैं  कैसे मानू,  तू  सचमुच में  होता  है ।।

एम एल ए और मन्त्री बन गए, भारत की सरकारो में ।
गेङ्गरेप् के दोषी बच रहे, दिल्ली  के  दरबारो  में ।।

निर्दोशो को पकड़ लिया,और बंद किया आज थाने में ।
एक निर्दोशी बाप मरा है , बेटी  की  लाज  बचाने में ।।

रात गयी वो बात गयी,अब रूह  कापती है   दिन को ।
झंडा लेकर निकल पड़े तुम,आज बचाने मुजरिम को।।

खेर छोड़िये,सुनो खेर की ये पगली क्या बोल गयी।
क्या है इनके मन के अंदर, पोल खुदी की खोल गयी।।

क्या बोला था उसने सबसे,अजब गजब ये किस्सा है ।
बलत्कार और रेप हमारी संस्कृति का हिस्सा है ।।

क्या यही संस्कृती है भारत की,मत इसको बदनाम करो।
नहीं बोलना आता अगर तो,मुँह पर अपने लगाम रखो ।।


सांवरिया तू कहाँ छुपा है ,सांवरिया यूं कहता है ।
दया करो हे राम हमारे  "दयाराम"यहाँ  रहता है ।।

(D.R.Sanwariya) की वॉल से ।।
ऐसी भी क्या मजबूरी जो,मुँह अपना ना खोल सके । ऐसी भी क्या मजबूरी जो,मुँह अपना ना खोल सके । Reviewed by Girraj Prasad Raman on 06:55 Rating: 5

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