ऐसी भी क्या मजबूरी जो,मुँह अपना ना खोल सके ।
Girraj Prasad Raman
06:55
ऐसी भी क्या मजबूरी जो,मुँह अपना ना खोल सके । कठवा और उनाव कांड पर,एक शब्द ना बोल सके ।। मन करता है तिलक लगाकर,मैं भी जय श्री...
ऐसी भी क्या मजबूरी जो,मुँह अपना ना खोल सके ।
Reviewed by Girraj Prasad Raman
on
06:55
Rating:
Reviewed by Girraj Prasad Raman
on
06:55
Rating: